व्यंग्यात्मक कविता:- हाय ये गर्मी !

गर्मी ने बेचैन कर दिया,

 जाएं तो जाएं कहां?

 हाय! यह तपती धूप, ठंडक पाएं तो पाएं कहां?

दिन प्रतिदिन तापमान बढ़ रहा, आसमान से नहीं बरस रही पानी की कोई बूंद!

है यह भूल इंसान की, जो जानते हुए भी अनजान बन बैठा है!

अपने निजी स्वार्थ की खातिर, जंगलों को नष्ट कर बैठा है!

 कैसे होगी वर्षा? जब जंगल ही नहीं बचेंगे!

 मिलेगी नहीं जब शुद्ध हवा,तो इंसान का बचना भी होगा मुश्किल!

 इस गर्मी से निजात पाने के लिए, हमें लगाने होंगे पेड़ ही पेड़!

 पेड़ों से ही जब मिलेगी ठंडी हवा, तब होगी गर्मी दूर!

 परिवार का हर सदस्य साल में एक पेड़ लगाएं,खुद से वादा कर लें जरूर!

 ✒️लालिमा देवी रावत की कलम से।✒️

©सर्व अधिकार प्रकाशाधीन।

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