दलित व्यवसायियों की नई पीढ़ी उभर रही है। आइए मिलते हैं 5 दलितों से जिन्होंने जातिगत सीमाओं को पार कर Entrepreneur की ओर कदम बढ़ाया है।

 भारत में उदारीकरण के तीन दशकों के बाद, कई दलित उद्यमी अब कंपनियों के स्वामी बन चुके हैं। फिक्की, एसोचैम और सीआइआइ की तरह, दलितों ने भी अपना संगठन डिक्की (DICCI) स्थापित किया है। यह संगठन दलित समुदाय में उद्यमिता की भावना को प्रोत्साहित कर रहा है। आइए, हम देश के पांच दलित उद्यमियों से मिलते हैं।


DAS ऑफशोर इंजीनियरिंग प्राइवेट लिमिटेड के संस्थापक अशोक खाड़े की संघर्ष की कहानी युवा उद्यमियों के लिए प्रेरणादायक है। उन्होंने कठिनाइयों के बावजूद अपनी मेहनत से शिक्षा प्राप्त की और जीवन में सफलता हासिल की। खाड़े के पिता एक मोची थे, जो मुंबई में एक पेड़ के नीचे काम करते थे। अशोक खाड़े, जिन्होंने कभी भूखे पेट सोने का अनुभव किया और महीने में केवल 90 रुपये कमाए, आज उनकी कंपनी का वार्षिक टर्नओवर 500 करोड़ रुपये से अधिक है। बचपन में गरीबी का सामना करने वाले खाड़े अब मुंबई के प्रमुख उद्योगपतियों में गिने जाते हैं।

भारत के पहले दलित अरबपति के रूप में जाने जाने वाले राजेश सरैया स्टील मोंट ट्रेडिंग लिमिटेड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं। इस कंपनी का मुख्यालय जर्मनी के डसलडॉर्फ में स्थित है। उनकी कंपनी स्टील ट्रेडिंग, उत्पादन, वस्त्र और शिपिंग के क्षेत्र में विशेषज्ञता रखती है और इसके कार्यालय विभिन्न देशों में फैले हुए हैं।

राजा नायक का जन्म कर्नाटक के एक दलित परिवार में हुआ। 17 वर्ष की आयु में, उन्होंने अमिताभ बच्चन की एक फिल्म से प्रेरित होकर मुंबई में रियल एस्टेट के क्षेत्र में कदम रखा। टी-शर्ट और फुटवियर की बिक्री से अपने करियर की शुरुआत करने वाले राजा नायक ने अपने व्यवसाय को अंतरराष्ट्रीय शिपिंग, लॉजिस्टिक्स, पैकेजिंग और वेलनेस उत्पादों में विस्तारित किया। वर्तमान में, उनके उद्यमों का कुल टर्नओवर लगभग 60 करोड़ रुपये है।

कल्पना सरोज का जन्म एक दलित परिवार में हुआ और उनकी शादी केवल 12 वर्ष की आयु में हो गई। वर्तमान में, वे मुंबई की कंपनी कामानी ट्यूब्स की अध्यक्षता कर रही हैं। उन्होंने अपने कई वर्ष मुंबई की झुग्गियों में अपने पति के परिवार के साथ व्यतीत किए हैं, और उन्हें अक्सर 'ओरिजनल स्लमडॉग मिलियनेयर' के रूप में जाना जाता है।

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने सोमवार (3 फरवरी) को बजट पर चर्चा के दौरान जातिगत जनगणना की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि देश में कई बड़ी कंपनियाँ हैं, लेकिन इनमें से किसी का भी मालिक दलित या ओबीसी समुदाय से नहीं है। 





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